तुम अपने बेहद सुरक्षित किले में आकुल व्याकुल यह सोचते हो,
कि सेना लिये जो बाहर इंतज़ार कर रहा है, दुश्मन वही है

और तुम अपनी साहसी सेना को भीषण युद्ध में घसीटते वक्त यह समझते हो,
कि इस मोटी सी दीवार की दूसरी ओर जो महल में विराजमान है, दुश्मन वही है

मैं समूचे प्रान्त के ऊपर नीलगगन में उड़ान भरते साफ साफ यह देखता हुँ,
कि हज़ारों का खून मांगती, जोधा-अकबर को जुदा करती, यह जो कमबख्त दीवार है,
असली दुश्मन वही है।

हे शहरी मानव क्या तुम भी हर रोज़ नहा कर कपड़ों के साथ इसी प्रकार की कोई अदृश्य किलेबंदी को पहन लेते हो?
कॉलेज, दफ्तर, मंदिर या पार्टी – हर जगह उस पथरीली दीवार का बोज ढोए फिरते हो?

किन्तु यह जान लो कि घृणा, उपेक्षा, तिरस्कार और तानों को खदेड़ती यह दीवार जब,
लाचार की आह, बालक की हँसी और बारिश की आवाज़ तक को भीतर आने न दे तब,
मानवता की दुश्मन वही है।