Category: Poetry

Gandhinagar – A poem

Gandhinagar / ગાંધીનગર

gandhinagarદસ વાગ્યામાં લંચ, ઓફીસમાં તાણે તંત, ખેલે પ્રપંચ
આઠ વાગતામાં ઊંઘી જતું, નિવૃત્તોની તાસીર સમું આ ગામ
સરકારી સેવાના નામે આખો દા’ડો સચિવાલયમાં મ્હાલે
કહેવા માટે કેપિટલ પણ નંબર બીજો આવે Continue reading

Defences

तुम अपने बेहद सुरक्षित किले में आकुल व्याकुल यह सोचते हो,
कि सेना लिये जो बाहर इंतज़ार कर रहा है, दुश्मन वही है

और तुम अपनी साहसी सेना को भीषण युद्ध में घसीटते वक्त यह समझते हो,
कि इस मोटी सी दीवार की दूसरी ओर जो महल में विराजमान है, दुश्मन वही है Continue reading

First dig at poetry!

Recently I came back from Ladakh. Now, people generally tend to get inspired by the majesty of nature at high places in the Himalayas and art comes out of their souls. However, I happened to write these 2 poems as an aftershock which I felt after coming back to Mumbai.

1. Mumbai

वह हिमालय की पहाड़ियों में घूमते वक्त अक्सर ये सोचता
के यहाँ लोग कैसी-कैसी प्रतिकूल परिस्थितियों में जीते हैं।
क्या बिजली, क्या बल्ब, क्या पंखे, क्या टीवी?
जहाँ सर्दियों में सूरज की गर्मी और नल से बहता पानी भी एक “लक्ज़री” है।
यही ख्याल उसके दिमाग में तब भी मंडरा रहा था जब वह बम्बई वापिस लौटा
पर जब उसने विरार फ़ास्ट लोकल ट्रेन के धक्को का स्वाद चखा तब वह ये बात समझ चूका
के भै कौनसी परिस्थिति ज्यादा विषम है।

2. Rains

मुझे बचपन से बारिश पसंद है। क्यों?
जब भी वो बरसती है तब लगता है,
के जैसे इस अजेय, किलेबंद से शहर को शह मिली।
जिसे प्रकृति का कोई और तत्त्व मात न दे सका,
आज उसके फौलादी कवच में एक छोटा सा सुराख़ हुआ,
जिसमे से रस अंदर रिस रहा है।
मुझे बचपन से बारिश पसंद है।

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